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रजाशाहपहलवी की विदेश नीति की समीक्षा कीजिए।


रजाशाह पहलवी की विदेश नीति की समीक्षा कीजिए। Examine the foreign policy of Reza Shah Pahalvi.

विदेश नीति के क्षेत्र में रजाशाह ने शांति की नीति अपनाई। सोवियत संघ ने शुरू में उसका समर्थन किया और पश्चिमी सामाज्य के बगुल से मुक्त हाने में उसकी मदद की। पड़ोसी राज्यों के साथ रजाशाह ने मैत्री का संबंध रखा। अप्रैल 1927 में तुर्की तथा अफगानिस्तान के साथ उसकी मैत्री संधि हुई।

1934 ई० में रजाशाह ने भी तुर्की की यात्रा की, जिससे दोनों देशों की मित्रता में दृढ़ता आई। 1937 ई० में ईरान, तुर्की, इराक तथा अफगानिस्तान के बीच सादाबाद की संधि हुई।

हस्ताक्षरकर्ताओं ने वैदेशिक क्षेत्र में सहयोग और एक-दूसरे पर आकरमण करने का वचन दिया।

ब्रिटेन के साथ ईरान के संबंध ने कई उतार-चढ़ाव देखें। सबसे पहले बहरीन को लेकर दोनों के बीच झगड़ा आरंभ हुआ।

I6 मई, 1928 को एक ऑग्ल-ईरानी संधि संपन्न हुई। ब्रिटिश वायुयानों को ईरानी तट पर से उड़ने की अनुमति मिल गई।

प्रथम विश्वयुद्ध के बाद सोवियत संघ और ईरान के संबंध का आधार 1921 ई० की संधि है। रूस की नई सरकार ने ईरान में रूस के जारकालीन अधिकारों को स्वेच्छा से छोड़ दिया।

अतः जब 1922 ई० में उत्तरी ईरान बिटेन और अमेरिका को कुछ आर्थिक सुविधाएं मिली तो सोवियत संघ ने इसका कड़ा विरोध किया। ईरानी-सोवियत व्यापार के कारण भी कई तरह की दिक्कते उत्पन्न हुई। लेकिन, 1927 ई० में दोनों देशों के बीच एक संधि हुई और इन सारे विवादों का निबटारा हो गया। लेकिन, सोवियत संघ के साथ उसका संबंध फिर खराब हो गया और 1939 ई० में दोनों देशों के संबंध में सौहार्द्रपूर्ण भावना नाममात्र की रह गई।

सितम्बर, 1939 में यूरोप में द्वितीय विश्वयुद्ध छिड़ जाने से ईरान की स्थिति में बड़ा परिवर्तन हुआ। रजाशाह ने हिटलर से गठबंधन शुरू कर दिया। जर्मन इन्जीनियर और जासूस ईरान में काम करने लगे। मई-जून, 1941 में युद्ध दक्षिण-पश्चिम एशिया में फैल गया। जर्मन टैंक मिस्त्र की ओर बढ़ने लगे। 22 जून को जर्मनी ने सोवियत संघ पर भी हमला कर दिया। इस स्थिति में ईरान की सामरिक स्थि अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई।

ब्रिटिश और सोवियत अधिकारियों ने उसे राजगद्दी छोड़ने पर विवश किया और 16 सितम्बर, 1941 ई० को उसे गही छोड़ देनी पड़ा। वह मारिशस के ब्रिटिश द्वीप में भेज दिया गया। 1944 ई. में जोहान्सबर्ग में उसकी मृत्यु हो गई। उसका पुत्र मुहम्मद रजा अब ईरान की गही पर आया, लेकिन देश के कल्याण के लिए वह कुछ नहीं कर सकता था। ईरान के सारे साधन सोवियत संघ में युद्धोपयोगी सामान पहुँचाने में लगाए गए।दिसम्बर, 1943 को ब्रिटेन, संयुक्त राज्य अमेरिका तथा सोवियत संघ के राज्याध्यक्षों का शिखर सम्मेलन दिसम्बर, 1945 में ब्रिटिश और अमेरिकी सेना ईरान की भूमि से हट गई। लेकिन, सोवियत संघ ने अपनी सेना हटाने में आनाकानी की। इस हालत में ईरान इस प्रश्न को संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद् में ले गया, वहाँ इस बात पर काफी वाद विवाद हुआ, लेकिन कोई नतीजा नही निकला। अंत में दोनों पक्षों के बीच प्रत्यक्ष वार्तालाप हुआ और मई 1946 में सोवियम सेना भी ईरान से वापस चली गई। किंतु इस उथल-पुथल से ईरानी जनता में अभूतपूर्व राष्ट्रीय जागरण आया, जिससे वह पाश्चात्य देशों के किसी भी आधिपत्य को मानने को तैयार नहीं रही। ईरान का यह नवीन राष्ट्रवाद डॉ० मुसद्दिक के व्यक्तित्व में प्रकट हुआ जिसकी चर्चा हम आगे करेंगे।


अरब राष्ट्रवाद पर एक निबंध लिखें।

बीसवीं शताब्दी के शुरू होते ही अरब राष्ट्रवाद पश्चिम एशिया का एक सशक्त आंदोलन बन गया। अलेप्पों के कुर्द जाति के बिचारक अब्दुर्रहमान अल-कवाकिबी (1849-1903) ने दो प्रसिद्ध ग्रंथों - तबाई अल- इस्तिबदाद तथा उम-अल-कुरा की-रचना की और यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि इस्लामी जगत का कल्याण तभी संभव होगा जब सत्ता तुर्का के हाथों से अरबों के पास आ जाए। उसका विचार था कि अरब इस्लामी दुनिया का केन्द्र हैं, अरबी भाषा उसके सांस्कृतिक जीवन का केन्द्र हैं और अरब इस्लाम की आधुनिक कुरीतियों से मुक्त है।

इसी समय मक्का का शरीफ मुहम्मद साहब का बंशज होने के नाते इस्लाम के संरक्षक और इस्लामी दुनिया के आध्यात्मिक नेता होने का दावा करने लगा। 1904 ई० में एक सीरियाई ईसाई नाजीब आजुरी ने पेरिस में एक अरब राष्ट्रीय सभा (लीग द् ला पात्री अरब) की स्थापना की तथा अगले वर्ष फ्रांसीसी भाषा में 'ल रेवेइ दू अरब दो लाजी तुर्क (तुर्की एशिया में अरब राष्ट्र की जागृति) नामक ग्रंथ लिखा। इसमें उसने कहा कि अरबो की एका राष्ट्रीय इकाई है जिसमें ईसाई और मुसलमान दोनों शामिल हैं अरब राष्ट्रों को तुर्की के आधिपत्य से मुक्त होना चाहिए। सार्वभौम इस्लाम या अखिल तुर्कबाद की धाराएँ बेकार हैं।


युवा तुर्क क्रांति और अरब राष्ट्रवाद

1908 में तुर्की को क्रान्ति हुई और सुलतान अब्दुल हमीद की निरंकुशता का अंत हो गया। युवा तुर्की ने अखिल ओटोमनवाद तथा पान इस्लामिज्म की नीति अपनाई और आरंभ में साम्राज्य की सभी जातियों के समन्वय पर जोर दिया। अरबों के साथ भाईचारे का संबंध स्थापित करने के लिए एक संगठन की भी स्थापना की गई तथा मक्का के शरीफ के वंशज हुसैन को मक्का के अमीर का पद प्रदान किया गया।

लेकिन, तुरंत ही प्रतिक्रिया प्रारंभ हुई और कस्बों को घोर निराशा का सामना करना पड़ा। दिसम्बर में नई संसद का चुनाव हुआ। इस चुनाव में अरवों के केवल साठ प्रतिनिधि ही चुने जा सके यद्यपि साम्राज्य में उनकी आबादी सबसे अधिक श्री। शीघ्र ही युवा तुर्कों की नीति भी बदल गई और वे अरब राष्ट्रीयता को कुचलने की नीति पर चलने लगे। इसका परिणाम यह हुआ कि अरब राष्ट्रीयता पुनः सक्रिय हो उठी। उनके कई गुप्त संगठन कायम हुए। उनकी शाखाएँ संपूर्ण अरब जगत में फैल गई। वे अरबों के अधिकार की माँग करने लगे।

विद्यार्थियों ने एक साहित्यिक गोष्ठी द्वारा आपसी संपर्क बढ़ाना शुरू किया और 19।। ई० में पैतीस अरब प्रतिनिधियों ने बसरा के सईद तालिब द्वारा मक्का के शरीफ हुसैन को एक पत्र भेजा कि वे उसे खलीफा मानकर उसके नेतृत्व में उसने तुर्कों का जुआ उतार फेंकने लिए तैयार है

1913 में पेरिस में चौबीस अरब राष्ट्रवादी नेताओं का एक छ: दिवसीय सम्मेलन हुआ। इसमें अरब की स्वायत्ता की माँग प्रस्तुत को गई! 

नवम्बर में इसकी राष्ट्रवादियों ने अरब के अब्दुल अजोज और इब्न-सऊद से बातचीत शुरू की। 1914 ई० में अजीज अल मसरी में अल अहद नामक एक गुप्त संस्था की स्थापना की जिसके सदस्य ओटोमन सेना के अरब अधिकारी बने।

इस तरह, प्रथम विश्वयुद्ध के पहले अरबों में तुर्की सामाज्य के प्रति भोषण असंतोष व्याप्त था और सारे साम्राज्य में अल-फतात तथा अल-अहद जैसी संस्थाओं के सदस्य भरे पड़े थे। अब तक मोरक्को, अलजीरिया, लीविया तथा मित्र, तुर्कों के हाथ से निकल चुके थे अरब प्रायद्वीप के दक्षिण में स्थित नऊद बर इब्न-सऊद ने अपना राज्य कायम कर लिया। तकों के अलहासा बंदरगाह पर भी उसका कब्जा हो गया। शमर में इब्न रशीद तथा हजाज में शरीफ हुसैन सर्वोपरि शासक बन गए थे।

अँगरेजों ने उनके खिलाफ अरबों को सहारा दिया और उनकी राष्ट्रीय आकांक्षाओं को उत्तेजित किया।


प्रथम विश्वयुद्ध और अरब राष्ट्रवाद :-

प्रथम विश्वयुद्ध में जब आटोमन सामाज्य जर्मनी के साथ मिल गया तो अंगरेजों ने अरबों को विद्रोह के लिए उकसाया और उनकी राष्ट्रीय भावना को उत्तेजित किया युद्धकाल में अरबों के विद्रोह का नेतृत्व शरीफ हुसैन इब्न अली ( 1853-1931) ने किया। 20 अक्टूबर, 1914 को ओटोमन सरकार के युद्ध में करने के दो ही दिन बाद उसने ब्रिटिश युद्धमत्री लॉर्ड किचनर से संपर्क स्थापित किया। अंग्रेज़ भी उसकी और काफी झुके रहे।

दोनों में यह तय हुआ कि तुकों के खिलाफ अरबों की मदद के बदले अँगरेज भी उसकी ओर काफी झुके रहे। दोनों में यह तथ हुआ कि तुर्को के खिलाफ अरबों की मदद के बदले अंगरेज उनकी स्वाधीनता के प्रयास में सहायता देंगे और उनकी राष्ट्रीय एकता को स्वीकार करेंगे। उधर जनवरी, 1915 में दमिश्क के बको परिवार का एक सदस्य शरीफ के पास एक संदेश लाया जिसमें अरबा को प्रमुख संस्था अल -फतात ने उसक साथ मिलकर तुर्की शासन के विरुद्ध विद्रोह करने का प्रस्ताव किया था। शरीफ हुसैन के चार पुत्र थे।

अतः इसे फ्रांसीसी हितों के साथ जुड़ा माना जाएगा और इराक में उनके अपने हित की समुचित रक्षा की व्यवस्था की जाएगी। शरीफ ने कहा कि इन मामलों को युद्ध के बाद तय किया जाएगा। अँगरेजों ने इस बात को मान लिया। इन शर्तों के आधार पर शरीफ हुसैन ने मक्का में अरब विद्रोह का झण्डा खड़ा किया, इस विद्रोह के कारण ओटोमन सामाज्य को अपार नुकसान उठाना पड़ा और मित्रराष्ट्रो को युद्ध प्रयास में बड़ी सहूलियतें मिली।


अंगरेजों का विश्वासघात :-

अंगरेजो की नीयत कभी साप नहीं थी व अग्या को धोख में रखकर अपना काम निकालना चाहते थे। अरब ब्रिटिश समझौता गुप्त रोति से हुआ था अतएव, ब्रिटेन के अन्य सहयोगियां को इसके संबंध में कोई जानकारी नहीं थी।

ओटोमन सामाज्य पर अपनी ललचाई निगाह डाले हुए थे और युद्ध के पश्चात उसके किसी-न-किसी क्षेत्र पर अधिकार करने को उतावले थे। इसलिए ओटोमन साम्गज्य के संबंध में मित्रराष्ट्रों के बीच भी कई मधियाँ हुई। ये समझौते एसे थे जो विटिश- अरब समझौते के विरुद्ध थे। 1916 ई० में फ्रांस ब्रिटेन ऑर रूस के बीच युद्धोपरात ओटोमन सामाज्य के विभाजन के लिए एक गुप्त संधि हुई।

1. सीरिया, इराक के मोसुल जिले तथा तुर्कों के अनातोलिया पर फ्रांस का दावा मान लिया गया।


2 चिटन के क्षेत्र में इराक का क्षेत्र एवं फारस की खाड़ी से लेकर पंच क्षेत्र तक के इलाके एवं फिलिस्तीन शामिल किए गए।


3 बाद में जब रूस की इस संचि के संबंध में जानकारी हुई तो उसने कान्स्टैण्टिनापुल तथा अनातालिया के प्रातो का अपने हिस्से में सम्मिलित करवा लिया।

1917 ई० में रूस में जव वॉल्शेविक क्रान्ति हुई, तव नई सरकार ने गुप्त साईक्स-पिकॉट समझौते को प्रकाशित कर दिया।

इसके तुरंत बाद अंगरेजों ने अरबों के साथ एक दूसरा विश्वासघात किया। यह फिलिस्तीन से संबंद्ध था। इस समय यहूदी लोग अपने एक राष्ट्रीय आवास के लिए आंदोलन कर रहे थे। वे फिलिस्तीन के मूल निवासी थे और उनकी मांग थी कि फिलिस्तीन में भी उनकी एक राष्ट्रीय राज्य कायम हो। अंग्रेजों ने यहूदियों के प्रति अपनी पूरी सहानुभूति प्रदर्शित की। अत: 2 नवम्बर, 1917 को अंगरेजों ने बालफोर-घोषणा की। इसके द्वारा यहूदियों को फिलिस्तीन में यहूदी राज्य कायम करने का ब्रिटेन की ओर से आश्वासन दिया गया इस घोषणा से अरबों पर घोर वजपात हो गया!.... 



रजाशाह पहलवी के मुघारों का वर्णन करें। Discuss the reforms of Raza Shah Pahalvi.

:जिस प्रकारतुर्की की अर्थव्यवस्था को दूर करते के लिये 

मसीहा की तरह मुस्तफा कमाल पाशा का ऐतिहासिक रंगमच पर पर्दापण हुआ. उसी तरह ईगन पर छाये अराजकता के बादलो को दर करने के लिये एक लोकनायक के रूप में रजाशाह पहलवो काअभ्युदय हुआ। ईरान के पुनर्निर्माण में रजाशाह पहलवी के सुधारों का महत्वपूर्ण स्थान है। 

रजाशाह पहलवी एक कुशल प्रशासक और क्रांतिकारी नेता या उसका उद्देश्य ईरान को नवीन एवं आधुनिक राष्ट्र बनाना था!

सेना में सुधार :- रजाशाह सर्वप्रथम अपनी राजनीतिक स्थिति सुरक्षित करना चाहता था। इसके लिये सेना का पुर्नगठन आवश्यक था। अभी तक ईरानी सेना का संगठन किसी नियम के अनुसार नहीं किया जाता था, लेकिन रजाशाह ने इसके संगठन को नियमित किया। सैनिकों को समय पर वेतन मिलने लगा। उनके बीच अनुशासन लाया गया। रजाशाह ने सर्वप्रथम अनिवार्य सैनिक शिक्षा और सैनिक सेवा की पद्धति प्रारंभ की। इस प्रकार ईरान की सेना अत्यंत आधुनिक हो गयी।

आवागमन के साधनों में सुधार :-सामरिक एवं व्यापारिक महत्व की दृष्टि से रजाशाह ने ईरान में रेल, सड़क, डाक-तार एवं हवाई सेवा के विकास के लिये अथक प्रयास किया। उसने जर्मन इंजीनियरों की सहायता से सड़के बनवाई, जिनके द्वारा गाँवो एवं शहरों को आपस में जोड़ दिया गया। 1939 ई० तक बीस हजार मील सड़क बनकर तैयार हो गयी। Trans Iranian रेलवे का निर्माण करके तेहरान को कैस्पियन सागर और फारस की खाड़ी के साथ जोड़ दिया गया। इससे राष्ट्र को सुरक्षा के अतिरिक्त व्यापार एवं आर्थिक प्रगति तथा एकता एवं राष्ट्रीयता को बढ़ावा मिला। इस रेलवे के निर्माण में जो खर्च हुआ वह रजाशाह ने ईरान की चाय एवं चीनी पर विशेष कर खगाकर वसुल किया। इसके निर्माण में विदेशों से पूंजी की सहायता लो गयी।


हवाई मार्ग के विकास में भी रजाशाह ने ध्यान दिया जर्मनी को सहायता से उसने ईरान के प्रसिद्ध नगरों के बीच वायुमार्ग का विकास किया। 1927-32 तक ईरान प्रसिद्ध नगरा और राजधानी तेहरान के मध्य हवाई जहाज उड़ने लगे। हवाई मार्गा को सरकार ने अतिरिक्त आर्थिक सहायता दी। ब्रिटेन द्वारा चलाया गया हवाई जहाज हिन्दुस्तान और ईरान के बीच उड़ने लग। 1928 ई० में इटली के बेड़े से दो जंगी जहाज मंगाकर नौसेना की नौव डालो गयी। इसी प्रकार डाक-तार विभाग का भी विकास हुआ। 1931 ई० British-Indo Europian तार कम्पनी का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया।


आर्थिक सुधार:-  ईरान की आर्थिक स्थिति उस समय बड़ी दयनीय थी, इसलिय रजाशाह ने इस ओर ध्यान दिया। आर्थिक क्षेत्र में सुधार लाने के उद्देश्य से रजाशाह ने अमेरिका से सहायता लेने का निश्चय किया।


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